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    गलत पोस्चर नहीं, रीढ़ की गंभीर बीमारी निकली

    Khabarin NCRBy Khabarin NCR08/07/202618 Views
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    14 वर्षीय किशोरी की 70 डिग्री टेढ़ी रीढ़ की जटिल सर्जरी से बची फेफड़ों और दिल की कार्यक्षमता*

    *हर 40-50 किशोरों में से एक को स्कोलियोसिस हो सकता है, लेकिन शुरुआती दौर में दर्द न होने के कारण अधिकतर मामलों का पता देर से चलता है।*

    पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट/फरीदाबाद /दिल्ली: एनसीआर, 08 जुलाई 2026:* बच्चों के कंधों का असमान दिखना, कमर का एक ओर झुकना या पीठ का टेढ़ा दिखाई देना अक्सर माता-पिता खराब पोस्चर या भारी स्कूल बैग का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन दिल्ली की 14 वर्षीय एक किशोरी के मामले में यही लक्षण रीढ़ की एक गंभीर बीमारी स्कोलियोसिस (Scoliosis) का संकेत निकले। समय पर इलाज नहीं होता तो उसकी रीढ़ की हड्डी इतनी अधिक टेढ़ी हो सकती थी कि फेफड़ों और हृदय पर दबाव पड़ने लगता और भविष्य में स्थायी शारीरिक विकलांगता का खतरा पैदा हो जाता।

    दुनियाभर में 10 से 16 वर्ष की आयु के लगभग 2 से 3 प्रतिशत बच्चों में एडोलेसेंट इडियोपैथिक स्कोलियोसिस (AIS) पाया जाता है। चिंता की बात यह है कि शुरुआती अवस्था में लगभग 90 प्रतिशत बच्चों को किसी प्रकार का दर्द नहीं होता, इसलिए बीमारी लंबे समय तक छिपी रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि रीढ़ का झुकाव 50 डिग्री से अधिक हो जाए तो यह बढ़ते शरीर के साथ लगातार बढ़ सकता है और आगे चलकर छाती की बनावट बिगाड़ने, सांस लेने में दिक्कत और गंभीर शारीरिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

    *कुछ महीने पहले किशोरी के माता-पिता ने देखा कि उसकी पीठ और कंधे असमान दिखाई देने लगे हैं। धीरे-धीरे यह टेढ़ापन तेजी से बढ़ने लगा, जिसके बाद वे उसे अमृता अस्पताल, फरीदाबाद लेकर पहुंचे। जांच में पता चला कि उसे एडोलेसेंट इडियोपैथिक स्कोलियोसिस है और उसकी रीढ़ लगभग 70 डिग्री तक टेढ़ी हो चुकी है। यह स्थिति इतनी गंभीर थी कि समय रहते उपचार नहीं किया जाता तो बढ़ती उम्र के साथ फेफड़ों और हृदय पर दबाव पड़ सकता था।*

    *डॉ. तरुण सूरी, सीनियर कंसल्टेंट एवं विभागाध्यक्ष, ऑर्थोपेडिक स्पाइन सर्जरी, अमृता अस्पताल, फरीदाबाद* ने बताया, “जब बच्ची हमारे पास आई तो उसकी रीढ़ लगभग 60 से 70 डिग्री तक मुड़ चुकी थी। यह केवल शरीर की बनावट का मामला नहीं रह गया था। चूंकि वह अभी बढ़ने की उम्र में थी, इसलिए रीढ़ का यह टेढ़ापन लगातार बढ़ सकता था और भविष्य में फेफड़ों व हृदय की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता था। समय रहते सर्जरी कर इस खतरे को टाल दिया गया।”

    परिवार की सहमति के बाद विशेषज्ञों की टीम ने अत्याधुनिक तकनीकों की मदद से जटिल स्पाइन सर्जरी की। ऑपरेशन के दौरान इंट्राऑपरेटिव न्यूरोमॉनिटरिंग के जरिए लगातार स्पाइनल कॉर्ड की कार्यक्षमता पर नजर रखी गई, जबकि सेल सेवर तकनीक का उपयोग कर मरीज के अपने रक्त को सुरक्षित रखकर दोबारा शरीर में पहुंचाया गया, जिससे बाहरी रक्त चढ़ाने की आवश्यकता काफी कम हो गई।

    सर्जरी पूरी तरह सफल रही और बच्ची को किसी भी प्रकार की न्यूरोलॉजिकल जटिलता नहीं हुई। चार से पांच दिनों के भीतर उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और अब वह धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रही है।

    *डॉ. अर्चित गोयल, सीनियर कंसल्टेंट, स्पाइन सर्जरी, अमृता अस्पताल, फरीदाबाद* ने कहा, “स्कोलियोसिस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसमें दर्द नहीं होता। यदि बच्चे का एक कंधा दूसरे से ऊंचा दिखाई दे, एक शोल्डर ब्लेड ज्यादा बाहर निकला हुआ लगे, कमर असमान दिखे या आगे झुकने पर पीठ का एक हिस्सा उभरा हुआ नजर आए, तो इसे सामान्य पोस्चर की समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और उपचार से गंभीर विकृति और बड़ी सर्जरी की जरूरत को काफी हद तक टाला जा सकता है।”

    विशेषज्ञों की सलाह है कि 10 से 16 वर्ष की आयु के दौरान, जब बच्चों की लंबाई तेजी से बढ़ती है, कम से कम एक बार स्कोलियोसिस की स्क्रीनिंग अवश्य करानी चाहिए। समय पर पहचान होने पर इलाज आसान होता है और भविष्य में फेफड़ों की कार्यक्षमता, शरीर का संतुलन और सामान्य गतिशीलता सुरक्षित रखी जा सकती है।

    featuead
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