लगातार खांसी, बार-बार एंटीबायोटिक और टीबी का इलाज भी शुरू हो गया, लेकिन असली वजह निकली सांस की नली में फंसी सुपारी। अमृता अस्पताल, फरीदाबाद में अत्याधुनिक मिनिमल इनवेसिव एयरवे प्रक्रिया से बच्चे की जान बचाई गई।
पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट: फरीदाबाद/दिल्ली-एनसीआर, 6 जुलाई 2026, जिस बीमारी को डॉक्टर कई हफ्तों तक निमोनिया समझकर इलाज करते रहे, वह दरअसल चार साल के मासूम के फेफड़े में फंसी एक छोटी-सी **सुपारी** थी। करीब एक महीने तक यह सुपारी बच्चे की सांस की नली में छिपी रही। पहले इसने दाएं फेफड़े में गंभीर संक्रमण (निमोनिया) किया और बाद में खिसककर बाएं मुख्य श्वास मार्ग (लेफ्ट मेन एयरवे) में पूरी तरह फंस गई। इससे बच्चे का पूरा बायां फेफड़ा बैठ गया (लंग कोलैप्स) और उसकी हालत बेहद गंभीर हो गई।
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बच्चे को करीब एक महीने से लगातार खांसी और बीच-बीच में बुखार आ रहा था। परिजनों के अनुसार, सुपारी गलती से उसकी सांस की नली में चली गई थी। इसके बाद परिवार कई अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा। अलग-अलग जगह एंटीबायोटिक दवाएं दी गईं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जब बीमारी ठीक नहीं हुई तो बच्चे का **टीबी का इलाज (एंटी-ट्यूबरकुलर थेरेपी)** भी शुरू कर दिया गया। इसके बावजूद उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही क्योंकि बीमारी की असली वजह किसी की पकड़ में नहीं आ सकी।
डॉक्टरों के अनुसार, शुरुआत में सुपारी दाईं ओर की सांस की नली में फंसी थी, जिससे दाएं फेफड़े में निमोनिया हो गया। बाद में यह खिसककर बाईं मुख्य श्वास नली में पहुंच गई और पूरी तरह फंस गई। इससे बाएं फेफड़े तक हवा का पहुंचना पूरी तरह बंद हो गया और फेफड़ा बैठ गया।

कुछ ही समय में बच्चे को सांस लेने में गंभीर तकलीफ होने लगी और वह **रेस्पिरेटरी फेल्योर** का शिकार हो गया। उसे वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। जांच में सांस की नली में विदेशी वस्तु (फॉरेन बॉडी) होने का पता चला। मामला बेहद जटिल होने और उन्नत **पीडियाट्रिक एयरवे इंटरवेंशन** की आवश्यकता के कारण उसे अमृता अस्पताल, फरीदाबाद रेफर किया गया। परिजनों का कहना है कि एक-दो अस्पतालों ने आवश्यक विशेषज्ञ सुविधाएं न होने के कारण इलाज से मना कर दिया था।
अमृता अस्पताल पहुंचने के समय बच्चे की हालत अत्यंत नाजुक थी। वह वेंटिलेटर पर 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट पर था, लेकिन बायां फेफड़ा पूरी तरह बैठ जाने के कारण उसके शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी।
**अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट – इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी, डॉ. सौरभ पाहुजा** ने कहा,
*”यह बेहद चुनौतीपूर्ण और जानलेवा मामला था। विदेशी वस्तु ने बच्चे की सांस की नली पूरी तरह बंद कर दी थी और पूरा बायां फेफड़ा बैठ चुका था। हर मिनट महत्वपूर्ण था। ऐसे मामलों में पीडियाट्रिक आईसीयू, पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया और इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होता है। आधुनिक एयरवे तकनीक और क्रायोप्रोब की मदद से हमने फंसी हुई सुपारी को सफलतापूर्वक निकाला और बच्चे की सांस दोबारा सामान्य कर दी।”*
इसके बाद पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर, पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया, पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी और इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी की विशेषज्ञ टीम ने तुरंत **मिनिमल इनवेसिव एयरवे प्रक्रिया** की। जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि सुपारी बाईं मुख्य श्वास नली में मजबूती से फंसी हुई थी, जिसके चारों ओर पस, संक्रमण और एक महीने में विकसित हुई सूजनयुक्त ऊतक की परत बन चुकी थी। अत्याधुनिक **क्रायोप्रोब** की मदद से सुपारी को सुरक्षित बाहर निकाला गया और बंद श्वास मार्ग को दोबारा खोल दिया गया।
प्रक्रिया के बाद धीरे-धीरे बच्चे का बैठा हुआ फेफड़ा फिर से फैलने लगा। अगले कुछ दिनों में उसकी ऑक्सीजन की जरूरत कम होती गई। उसे वेंटिलेटर से हटाया गया, फिर हाई-फ्लो ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया और अंततः वह बिना किसी ऑक्सीजन सहायता के सामान्य रूप से सांस लेने लगा। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉ. पाहुजा ने कहा, *”पांच साल से कम उम्र के बच्चों में छोटी चीजों को मुंह में डालने की आदत होती है, इसलिए उनके गले में सुपारी, मेवे, बीज या अन्य छोटी वस्तुएं फंसने का खतरा अधिक रहता है। यदि किसी बच्चे को दम घुटने की घटना के बाद लगातार खांसी बनी रहे, बार-बार निमोनिया हो या सांस लेने में तकलीफ हो, तो इसे सामान्य संक्रमण समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में समय रहते विशेषज्ञ केंद्र पर इलाज जीवन बचा सकता है।”*
डॉक्टरों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि यदि किसी बच्चे में दम घुटने की घटना के बाद लगातार खांसी, बार-बार निमोनिया या अचानक सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें। कई बार दम घुटने की घटना तो भूल जाती है, लेकिन सांस की नली में फंसी विदेशी वस्तु कई हफ्तों तक छिपी रहकर गंभीर संक्रमण, फेफड़े के बैठ जाने और जानलेवा जटिलताओं का कारण बन सकती है।
