पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट/फरीदाबाद: आर्य केन्द्रीय सभा (नगर निगम क्षेत्र) फरीदाबाद के तत्वावधान में श्रावणी पर्व के पावन उपलक्ष्य में सात सितंबर तक होने वाले आठ दिवसीय वेद प्रचार कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ आर्य समाज, एन एच-तीन नंबर के प्रांगण में हुआ।
कार्यक्रम की प्रारंभ में वैदिक भजनोपदेशक आचार्य सतीश सत्यम तथा मूलचंद आर्य ने अपनी मधुर वाणी में सुंदर और प्रेरणादायक भजनों की प्रस्तुति देकर पूरे वातावरण को भक्तिमय कर दिया। मंच का कुशल संचालन जितेंद्र सरल द्वारा किया गया। आर्य समाज के महामंत्री धर्मवीर आर्य ने कार्यक्रम में पहुंचे सभी आमंत्रित विद्वानों, अतिथियों और श्रद्धालु जनों का स्वागत किया और अंत में सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।

मुख्य वक्ता आचार्य योगेश भारद्वाज अधिष्ठाता, आर्य विद्याकुलम्, मुजफ्फरनगर ने अपने ओजस्वी संबोधन में प्रसिद्ध वैदिक मंत्र ‘ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि यह मात्र एक प्रार्थना नहीं, बल्कि लोक कल्याण, ज्ञानार्जन और सृष्टि के नियमों को समझने का संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह मंत्र मुख्य रूप से गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध, आपसी सहयोग तथा विद्या प्राप्ति के सामूहिक संकल्प को रेखांकित करता है।

आचार्य जी ने ईश्वर के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परमात्मा सर्वरक्षक है। उसने बिना किसी की सहायता के इस विशाल सृष्टि की रचना की है। ईश्वर को इस चराचर जगत का सर्वरक्षक मानते हुए यह दर्शन स्थापित करता है कि परमात्मा ने बिना किसी बाहरी सहायता के इस अद्भुत सृष्टि की रचना की है। उसने संसार के संचालन के लिए कुछ अटल नियम बनाए हैं, जो कभी परिवर्तित नहीं होते। संपूर्ण ब्रह्मांड इन नियमों के अधीन है। सभी ग्रह-नक्षत्र अपने निर्धारित पथ पर पूरी गति और निरंतरता के साथ नियमानुसार घूम रहे हैं। भगवान स्वयं इस संसार को बनाकर इसका पालन करते हैं और अपने बनाए नियमों का अक्षरशः पालन भी करते हैं।
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हम ईश्वर से ऐसी शक्ति की प्रार्थना करें, जिससे हम उसके बनाए प्राकृतिक और नैतिक नियमों का पालन कर सकें। हम परमात्मा को माता-पिता के रूप में स्वीकार करें, क्योंकि वही हमारा सर्वश्रेष्ठ पालन-पोषण करने वाले हैं।
उन्होंने चरित्र निर्माण पर जोर देते हुए कहा कि अपने चरित्र को आकर्षक और अनुकरणीय बनाएं। गुरु अपने छात्र को सभी श्रेष्ठ गुण देता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि पराक्रमी बनना है। बिना पराक्रम के विद्या अधूरी है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे आपसी द्वेष का त्याग करें, अपने चरित्र को आकर्षक और वाणी को मधुर बनाएं। जब हम प्रेम से बोलेंगे और सबके प्रति मित्र भाव रखेंगे, तभी समाज में लोकप्रिय और आदरणीय बन सकेंगे और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को चरितार्थ कर पाएंगे।
इस अवसर पर देशबन्धु आर्य, योगेन्द्र फोर, करमचंद शास्त्री, वसु मित्र सत्यार्थी, शिव कुमार टुटेजा, सतीश कौशिक, दयानन्द आर्य, संजय खट्टर आर्य, दयानंद विरमानी, होतीलाल आर्य, राज सिंह, विजेन्द्र शास्त्री, जगदीश विरमानी, संघमित्रा कौशिक, रुक्मणी टुटेजा, नर्वदा शर्मा, सुमन बत्रा, प्रतिभा यति सहित फरीदाबाद की विभिन्न आर्य समाजों के पदाधिकारी एवं अनेक गणमान्य प्रतिनिधि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।
