रोज़ा भले ही टूट जाये, पर ज़िन्दगी की डोर ना टूटने पाये।

फरीदाबाद: 04 मई, अक्सर फिल्मों में तो ऐसी कहानियाँ देखते हैं कि एक धर्म के वयक्ति ने ज़रूरत पड़ने पर किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति की धार्मिक परम्पराओं व बंधनो को दरकिनार करके मदद की, पर जब वास्तिवक जीवन में ऐंसे उदहारण सामने आते हैं तो दिल सचमुच गदगद हो उठता है।

ग्लोबली इंटीग्रेटिड फॉउंडेशन फ़ॉर थैलेसीमिया (गिफ्ट) के अध्यक्ष मदन चावला को आज जब नई दिल्ली से एक थैलेसीमिक बच्चे के ब्लड ट्रांसफ्यूज़न के लिये रक्त्त का इंतज़ाम करने का निवेदन आया, तो उन्होंने तुरन्त सोशियल मीडिया पर रक्त्त दाताओं की गुहार लगाई। अगले कुछ ही मिनटों में उनके पास एक मित्र पारस कोचर का फोन आया कि उनका एक जानकर ब्लड डोनेट करने को तैयार है। पता चला कि डोनर एक मुस्लिम नौजवान है और उसने रोज़े रखे हुवे हैं। फोन पर बात करते हुवे जब मदन चावला ने आफताब अंसारी को बताया कि बिना कुछ खाये-पीये खाली पेट वो रक्त्त दान नहीं कर सकेगा। अगले ही पल आफताब ने कहा किसी की ज़िन्दगी से बढ़कर रोज़ा नहीं हो सकता। तुरन्त खाना खाकर, आफताब दिल्ली के अपोलो अस्पताल में थोड़ी देर बाद शुभम अरोड़ा के लिये रक्त्तदान कर रहा था।

कोरोना वायरस का भय, ऊपर से मई के महीने की चिलचिलाती धूप व गर्मी, ऐंसे में अगर कोई व्यक्ति दूसरे अन्जान व्यक्ति के लिये अपना रोज़ा तोड़कर रक्त्तदान करता है, तो इससे बढ़कर अल्लाह या भगवान की बंदगी क्या हो सकती है, मदन चावला ने कहा। इसे शायद कुदरत का करिश्मा कहेंगे या ईश्वर/अल्लाह की मर्ज़ी कि थैलेसीमिया के इस पेशेंट के लिये सोशियल मीडिया के ज़रिये जिस दूसरे ब्लड डोनर ने मदन चावला से सम्पर्क साधा वो भी एक मुस्लिम ही निकला। सदाम मुजीब नाम का यह नौजवान कल सुबह अपोलो अस्पताल में ब्लड डोनेट करने जायेगा।

अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे,
एक नूर ते सब जग उपजाया कौन भले को मंदे।

सलाम ऐंसी सोच को, ऐंसे जज़्बे को, ऐसी पवित्र-पाक नियत को।

थैलेसीमिया से सम्बंधित अधिक जानकारी व सहायता के लिये हमारे पाठक मदन चावला से +91 9811089975 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

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