पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट, फरीदाबाद/नई दिल्ली: आज दिवाली है, श्रीराम घर आ रहे हैं और हम खुशियाँ मना रहे हैं। आज श्रीराम की, अहंकारी रावण को मारकर घर वापसी हुई थी। रावण के पुतले फूँकना, दीये जलाना, मिठाई-तोहफे बाँटना, ये सब बच्चों की कथाएँ हैं। दिवाली की कथा का सच्चा संदेश यह है कि अंदर के रावण, मतलब अहंकार पर विजय प्राप्त हो जाए, तो श्रीराम घर आएँगे। घर यानी तुम्हारा यह शरीर। तुम कथा सुन लेते हो, परंपरा भी चलाते रहते हो, पर जीवन में संदेश नहीं उतार पाते; वो संदेश ग्रहण करना ज़रूरी है। आंतरिक कथा यह है कि श्रीराम शरीर रूपी घर में आएँ; सीमेंट वाले घर में तो केवल श्रीराम की मूर्ति है। क्या तुम्हें मूर्ति वाले श्रीराम चाहिए या जीवित श्रीराम जो अयोध्या आए थे? श्रीराम वहीं आते हैं जहाँ रावण नहीं होता। रावण और श्रीराम में से कोई एक ही रह सकता है, इसीलिए इसे अद्वैत कहा गया है; बाहर रावण और श्रीराम का खेल द्वैत है। द्वैत तुम्हारे बाहर भी है और अंदर भी; जैसे बाहर से तो तुम सज्जन, धार्मिक इंसान हो, पर अंदर क्या है? अंदर तो अँधेरा, दुर्गंध और गंदगी है; ज्ञान की ज्योति तो प्रकट ही नहीं हुई है। रावण का मतलब है – अंदर का ‘मैं’, यानी अहंकार। रावण महापंडित था, उसने दस बार अहंकार किया इसलिए उसके दस मुख थे। क्या तुम्हारा दस से भी ज़्यादा चीज़ों पर अहंकार तो नहीं है? इसलिए जागो। रावण मरा, पर क्या तुम्हारे अंदर का रावण मरा जो कहता है कि मैं डॉक्टर, ऑफिसर, मिनिस्टर, स्टार या सेठ हूँ? जब तक अंदर रावण है, तब तक श्रीराम नहीं आएँगे, बाहर केवल मूर्ति रहेगी। इसलिए जब रावण बाहर जाएगा, तभी श्रीराम सूरत बनकर अंदर समाएँगे। जिसने जीते जी अपने अंदर श्रीराम को प्रकट नहीं किया, उसे मरने के बाद श्रीराम नहीं मिलते। रहे होगे तुम दुनिया के बहुत बड़े सेठ, मिनिस्टर, स्टार या प्रेसिडेंट, पर शास्त्र कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों की सजाएँ मिलेंगी; इंसान कभी कीड़ा-मकोड़ा, पेड़-पहाड़, पंछी या जानवर बन जाएगा पर उसे श्रीराम नहीं मिलेंगे। जब तुम मरोगे तो रावण वाला काला शरीर निकलेगा और जन्म-मरण के चक्र में आना पड़ेगा, यानी तुम्हारा यह मनुष्य जन्म फेल हो गया। दिवाली पर दीये जलाए, प्रकाश किया, सफाई भी की पर अगर अंदर कचरा यानी अहंकार पड़ा है तो अंदर श्रीराम नहीं आएँगे। बाहर के श्रीराम तो प्रतीकात्मक हैं, यह कहने के लिए कि मुझको अपनी श्वासों की माला में लाओ, जैसे हनुमान जी ने छाती फाड़कर अपनी भक्ति दिखाई कि उनके अंदर केवल श्रीराम ही चलते हैं। जब अयोध्या में माँ सीता ने हनुमान जी को नवरत्नों की माला दी तो उन्होंने उसे यह कहकर फेंक दिया कि इसमें श्रीराम कहाँ हैं, मैं इसका क्या करूँगा? जब उनसे पूछा गया कि हनुमान, दिखाओ क्या तुम्हारे अंदर श्रीराम हैं, तो उन्होंने कहा कि मेरी श्वासें श्रीराम नाम की माला जपती हैं, बाहर की माला तो छूट गई। श्रीराम ने जब पूछा कि तुम क्या चाहते हो, तो वो कहते हैं, “प्रभु! अगर देना ही चाहते हो तो बस यही दो कि केवल यह जीवन ही नहीं, बल्कि अनंत समय तक, हर पल मैं आपके चरणों में रहूँ।” भगवान ने तथास्तु कह दिया, इसलिए आज हर जगह श्रीराम के साथ हनुमान जी मिलते हैं। क्या तुमने कभी श्रीराम से माँगा कि मुझे अपने चरणों में अनंत समय तक रखो? यदि श्रीराम को चुनोगे, तो रावण मतलब-‘मैं’, सोना, चाँदी, बँगला, गाड़ी, दौलत नहीं मिलेगी। इन दोनों में से कोई एक चुनना होगा; क्या चुनोगे बोलो? तुम तो हर समय दौलत के लिए भिखारी बने हुए हो। अंदर रावण रूपी ‘मैं-मैं’ भरी पड़ी है। अंदर हर समय मेरा घर, मेरा बँगला, मेरी गाड़ी ही चलती रहती है। यह नकली दिवाली है; जिस दिन श्रीराम अंदर आएँगे उसी दिन असली दिवाली होगी।

दिवाली का हर साल उत्सव मनाने का मतलब ही यह है कि अभी श्रीराम तुम्हारे अंदर नहीं आए हैं; जिसमें श्रीराम आ जाते हैं, वो श्रीराम को वापस नहीं भेजता। जिसके श्रीराम अंदर आ जाते हैं, उसकी हर पल दिवाली होती है, वो किसी एक दिन का मोहताज नहीं होता। दिवाली है, श्रीराम आए हैं पर लोग लक्ष्मी पूजन करेंगे कि लक्ष्मी माता आएँगी। इसलिए लक्ष्मी माँ भी हँसती हैं कि ये मंदिर जाएँगे, श्रीराम जी की मूर्ति के आगे झुकेंगे, पर माँगेंगे मुझसे माया कि मुझको बँगला और गाड़ी दे दो। आज जागने का दिन है, जागना ही होगा। अंदर दुख ही सबसे बड़ा अँधेरा है, अमावस्या है। ज्योत जलने को तैयार है पर उसे अहंकार के कटोरे ने ढक रखा है। कटोरा हटे, तो ज्योत प्रकट हो। फिर ज्योत को चाहे तुम लक्ष्मी माँ, श्रीराम, श्रीकृष्ण, गुरु नानकदेव, बुद्ध, महावीर, कबीर कुछ भी कह लो। तुम यह मरा हुआ शरीर नहीं हो, मिट्टी के इस मुर्दे शरीर में उस ज्योत को जगाओ जो वास्तव में तुम हो। अच्छी बात है कि तुम दिवाली मना रहे हो। मौज लो, क्योंकि माया मौज करने के लिए है पर यदि इसका आंतरिक संदेश नहीं लिया और ज़िंदा श्रीराम को अंदर प्रकट यानी ‘ज्योतिर्मय’ नहीं किया, तो फिर अंत में केवल पश्चाताप करना पड़ेगा। इसलिए जागो, कहीं देर ना हो जाए।
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