75 से अधिक देशों के विशेषज्ञ होंगे शामिल; AI, सैटेलाइट तकनीक और पूर्व चेतावनी प्रणालियों से भूस्खलन का खतरा कम करने पर होगा मंथन
पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट/फरीदाबाद: 14 अक्टूबर, 2026, भारत पहली बार विश्व भूस्खलन फोरम (World Landslide Forum) की मेजबानी करने जा रहा है। इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सातवां संस्करण 23 से 27 नवंबर, 2026 तक फरीदाबाद (दिल्ली-एनसीआर) में आयोजित होगा। अमृता विश्व विद्यापीठम इसकी मेजबानी करेगा। इससे पहले छठा विश्व भूस्खलन फोरम वर्ष 2023 में इटली के फ्लोरेंस में आयोजित हुआ था।
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वर्ष 2008 से हर तीन साल में आयोजित होने वाला यह सम्मेलन दुनिया भर के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, इंजीनियरों और नीति-निर्माताओं को एक मंच पर लाता है। इसका उद्देश्य भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम करना, नई तकनीकों को साझा करना और आपदा प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है।
अंतरराष्ट्रीय भूस्खलन संघ (ICL) के तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सहयोग कर रही हैं।

75 से अधिक देशों की भागीदारी
इस सम्मेलन के लिए अब तक 700 से अधिक शोध सारांश और शोधपत्र, 1,900 से अधिक लेखक, 75 से अधिक देश और क्षेत्र, 760 से अधिक संस्थान तथा 1,280 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी जुड़े हैं। शोध सारांश जमा करने के दूसरे चरण की अंतिम तिथि 20 अक्टूबर है।
‘सुरक्षित और आपदा-प्रतिरोधी समुदायों के लिए भूस्खलन विज्ञान और व्यावहारिक समाधान’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में छह प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा होगी। इनमें भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण, रिमोट सेंसिंग और पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक मॉडलिंग और रोकथाम तकनीक, जोखिम मानचित्रण एवं प्रबंधन, भूस्खलन विज्ञान में नई प्रगति तथा विभिन्न क्षेत्रों की भूस्खलन घटनाओं का अध्ययन शामिल हैं।
22 नवंबर को आयोजित सम्मेलन-पूर्व कार्यशालाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेंटिनल-1 और निसार (NISAR) उपग्रहों से निगरानी, InSAR, डिजिटल ट्विन, भूस्खलन की भविष्यवाणी, पूर्व चेतावनी प्रणाली और भू-स्थानिक मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों पर विशेष चर्चा होगी।
भूस्खलन की चेतावनी देने वाली तकनीक विकसित करने में अमृता की अग्रणी भूमिका
अमृता विश्व विद्यापीठम पिछले दो दशकों से भूस्खलन की पहचान, निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियों पर काम कर रहा है। वर्ष 2006 में विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्री माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) की प्रेरणा से शुरू हुए इस अनुसंधान का उद्देश्य कम लागत वाली तकनीकों के माध्यम से समय रहते चेतावनी देकर लोगों की जान बचाना है।
विश्वविद्यालय ने भूस्खलन की पहचान और पूर्व चेतावनी के लिए दुनिया की पहली वायरलेस सेंसर नेटवर्क आधारित प्रणाली विकसित और स्थापित की थी। बाद में केरल के मुन्नार में इसे AI और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक से उन्नत किया गया। भारत सरकार के अनुरोध पर सिक्किम में भी ऐसी प्रणाली स्थापित की गई।
*डॉ. मनीषा वी. रमेश, प्रो-वाइस चांसलर, अमृता विश्व विद्यापीठम और निदेशक, अमृता सेंटर फॉर वायरलेस नेटवर्क्स एंड एप्लीकेशंस,* के नेतृत्व में विकसित तकनीकें जमीन की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी करती हैं। इस कार्यक्रम से 300 से अधिक सेंसर जुड़े हैं और इसका सकारात्मक प्रभाव 5,000 से अधिक लोगों के जीवन पर पड़ा है। विश्वविद्यालय के शोधकर्ता देश के 70 से अधिक भूस्खलन प्रभावित स्थलों का अध्ययन कर चुके हैं।
इस योगदान के लिए अमृता को लगातार तीन अवधियों—2017–2020, 2020–2023 और 2023–2026—में विश्व भूस्खलन आपदा न्यूनीकरण उत्कृष्टता केंद्र की मान्यता मिली है। इसके सेंटर फॉर वायरलेस नेटवर्क्स एंड एप्लीकेशंस को 2023 में आपदा जोखिम प्रबंधन में असाधारण योगदान के लिए ADA अवॉर्ड भी मिला।
डॉ. मनीषा वी. रमेश ने कहा, “भूस्खलन विज्ञान में हर नई प्रगति का उद्देश्य किसी की जान, घर या आजीविका बचाना होना चाहिए। अम्मा के करुणा और सेवा के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर अमृता वर्ष 2006 से विज्ञान, तकनीक और स्थानीय समुदायों के अनुभवों को जोड़कर पूर्व चेतावनी प्रणालियां विकसित कर रहा है। भारत में पहली बार विश्व भूस्खलन फोरम का आयोजन वैज्ञानिकों, सरकारों, उद्योग जगत और समुदायों को एक साथ लाने का महत्वपूर्ण अवसर है। हमारा लक्ष्य अनुसंधान को समय पर चेतावनी, प्रभावी कार्रवाई और स्थायी आपदा सुरक्षा में बदलना है।”
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सम्मेलन?
भूस्खलन से न केवल लोगों की जान और आजीविका को खतरा होता है, बल्कि सड़कें, रेलवे लाइनें, बिजली आपूर्ति और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे भी प्रभावित होते हैं।
यह सम्मेलन वैश्विक विशेषज्ञता को भारत लाने के साथ-साथ भूस्खलन विज्ञान, AI आधारित निगरानी, पूर्व चेतावनी तकनीक और आपदा जोखिम न्यूनीकरण में भारत की बढ़ती क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान को ऐसे व्यावहारिक समाधानों में बदलना है, जो भविष्य में भूस्खलन से होने वाली जनहानि और नुकसान को कम कर सकें।
