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जहां कीमो नहीं, एक गोली बनी सहारा, कैंसर के इलाज का नया चेहरा

टीबी समझकर महीनों इलाज होता रहा, लेकिन एडवांस जांच में सामने आया दुर्लभ कैंसर—टार्गेटेड थेरेपी ने बदल दी ज़िंदगी

पंकज अरोड़ा की रिपोर्ट/फरीदाबाद: 29 अप्रैल, 28 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल अर्जुन गुप्ता के लिए यह सब एक आम सी परेशानी से शुरू हुआ—लगातार रहने वाली खांसी। भारत जैसे देश में, जहां टीबी आम है, डॉक्टरों ने बिना ज्यादा देर किए उसे टीबी मान लिया और इलाज शुरू हो गया।

अर्जुन ने पूरे अनुशासन के साथ महीनों तक दवा ली। लेकिन खांसी नहीं गई। कमजोरी बढ़ती गई। और उम्मीद के बीच कहीं न कहीं एक सवाल भी उठने लगा। लगभग एक साल बाद जब अर्जुन अमृता अस्पताल, फरीदाबाद पहुंचे, तो डॉक्टरों ने इस बार मामले को गहराई से जांचा। जांच में जो सामने आया, वह चौंकाने वाला था—मेटास्टेटिक लंग एडेनोकार्सिनोमा (फेफड़ों का कैंसर)।

एक युवा, नॉन-स्मोकर व्यक्ति के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी। शुरुआती जांच में इलाज का स्पष्ट रास्ता नहीं मिला। आमतौर पर ऐसे मामलों में कीमोथेरेपी शुरू की जाती है, लेकिन यहां डॉक्टरों ने एक कदम आगे बढ़ाया।

अर्जुन का नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) टेस्ट किया गया—एक ऐसी एडवांस जांच जो सैकड़ों जीन को स्कैन करती है। इसमें एक दुर्लभ लेकिन अहम म्यूटेशन सामने आया—ROS1 जीन फ्यूजन, जो कुछ ही मरीजों में पाया जाता है, खासकर युवाओं और नॉन-स्मोकर्स में।

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डॉ. मौशुमी सूर्यवंशी, हेड – मॉलिक्यूलर एवं साइटोजेनेटिक्स लैब, अमृता अस्पताल, फरीदाबाद, बताती हैं,

“युवा मरीजों में, खासकर जो धूम्रपान नहीं करते, हमें सामान्य जांच से आगे जाना जरूरी होता है। व्यापक मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग से ऐसे दुर्लभ लेकिन इलाज योग्य म्यूटेशन मिलते हैं, जो पूरी ट्रीटमेंट दिशा बदल सकते हैं।”

इस रिपोर्ट के आधार पर अर्जुन का इलाज शुरू हुआ—एंट्रेक्टिनिब नाम की टार्गेटेड दवा से। इलाज की खास बात यह थी कि इसमें न कीमोथेरेपी की जरूरत थी, न अस्पताल में भर्ती होने की। बस रोज़ एक कैप्सूल, घर पर।

लेकिन इस दवा की असली ताकत कुछ और थी—यह ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर सकती है। जिन मरीजों में कैंसर दिमाग तक फैल चुका होता है, उनके लिए यह बेहद अहम होता है। यह दवा सिर्फ फेफड़ों में ही नहीं, बल्कि दिमाग में भी असर करती है।

और इसका असर बेहद तेजी से दिखा।

सिर्फ 8 हफ्तों में:

• फेफड़ों का ट्यूमर करीब 65% तक घट गया

• लिम्फ नोड्स में सूजन कम हो गई

• दिमाग में मौजूद घाव MRI में पूरी तरह गायब हो गए

उनके ऑन्कोलॉजिस्ट ने लिखा: “मरीज पूरी तरह सामान्य, काम पर लौट चुका है, कोई न्यूरोलॉजिकल लक्षण नहीं।”

डॉ. सूर्यवंशी आगे कहती हैं,

“टार्गेटेड थेरेपी ने कैंसर के इलाज को पूरी तरह बदल दिया है। अब हम बीमारी के मूल कारण—जीन स्तर पर—को निशाना बना सकते हैं। ऐसे मामलों में परिणाम तेज और बेहद प्रभावशाली होते हैं।”

चार महीने पहले तक अर्जुन जिस बीमारी को अपनी जिंदगी का अंत मान रहे थे, वहीं अब जिंदगी धीरे-धीरे लौट रही थी। ताकत वापस आई। थकान खत्म हुई। डर कम हो गया।

कुछ महीनों बाद, मैसूर में अपनी बहन की शादी में, अर्जुन सिर्फ एक मरीज नहीं थे—वह एक भाई थे। उन्होंने परिवार के साथ जश्न मनाया, डांस किया।

अर्जुन कहते हैं,

“जब पहली बार कैंसर का पता चला, तो लगा सब खत्म हो गया। महीनों तक मैं टीबी का इलाज करता रहा, लेकिन जवाब नहीं मिल रहे थे। आज मैं फिर से काम कर रहा हूं, परिवार के साथ समय बिता रहा हूं। यह सोचकर आज भी यकीन नहीं होता कि एक गोली रोज़ मेरी जिंदगी वापस दे सकती है।”

आज, एक साल बाद, अर्जुन पूरी तरह स्थिर हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक मरीज की रिकवरी नहीं, बल्कि कैंसर इलाज के बदलते दौर की झलक है:

• लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करें

• फेफड़ों का कैंसर सिर्फ स्मोकर्स तक सीमित नहीं है

• एडवांस जांच जैसे NGS अब आधुनिक इलाज का अहम हिस्सा बन चुकी है

अर्जुन की जिंदगी में बदलाव सिर्फ इलाज से नहीं आया—

बल्कि समय पर मिली सही वैज्ञानिक समझ से आया।

और आज के दौर में, यही समझ जीवन और अनिश्चितता के बीच सबसे बड़ा अंतर बन रही है।

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