जब तक समाज दोहरी मानसिकता से बाहर नहीं आएगा तब तक यह झूठा ढोंग दिखावा खत्म नहीं होगा: डॉ निक्की डबास

नई दिल्ली: 24 अगस्त, आज जाति और वर्ण व्यवस्था को लेकर एक सवाल सोशल मीडिया पर बहुत उछल रहा है कि जब ब्राह्मण विद्वान था क्षत्रिय बलशाली था और वैश्य चतुर था और शूद्र बाकी के तीन वर्णों की सेवा में व्यस्त था या यह कहें कि बाकी के तीन वर्ण उसे उसका गुजारा करने के लिए मेहनताना देते थे जो भी सेवा वह समाज की करता था उसके बदले तो फिर देश गुलाम कैसे हो गया इस बात का जवाब जानने के लिए इस लेख को पढ़ना और बदलते समाज के बदलते परिवेश को समझना अत्यंत आवश्यक है l देश की गुलामी का कारण लोगों का अपने स्वार्थ में लिप्त होना है और वह स्वार्थ में लिप्त होकर जब समाज को दरकिनार करके स्वयं और स्वयं के परिवार तक सीमित बुद्धि रह जाते हैं तब बाहर से आया कोई समाज उस समाज में धीरे-धीरे दीमक की तरह फैल कर उसे खोखला कर देता है क्योंकि बाहर से आने वाले लोग तो वहां आए ही अपना गुजारा करने के लिए है फिर भी इसको अच्छे से समझने के लिए इस पूरे लेख को समझना बहुत जरूरी है l जब किसी वर्ग समाज या समुदाय का लालच अपनी सीमाएं तोड़कर बढ़ जाए तो वह दूसरे की सीमाओं में उसके अधिकार क्षेत्र का हनन करने लगता है लोग दूसरे की थाली में परोसा हुआ खाना देखकर मचल जाते हैं लेकिन उस थाली में खाना परोसने के पीछे की मेहनत नहीं करना चाहते मेरी बात को इस प्रकार समझ लेगा कि ब्राह्मण विद्वान था उसे समाज को शिक्षित करने का दायित्व दिया गया सभी प्रकार के सामाजिक धार्मिक कर्मकांड करने का अधिकार भी उसे उसके बौद्धिक ज्ञान एवं विद्वता के आधार पर मिला लेकिन उसने अपनी विद्वता का प्रयोग अपने ज्ञान का प्रयोग क्षत्रियों से जमीनें हड़पने एवं उनके संसाधनों को अपना गुलाम बनाने में करना शुरू कर दिया उदाहरण के तौर पर आपने एक फिल्म देखी होगी मदर इंडिया जो कहीं ना कहीं समाज की एक सच्चाई को उजागर करती है क्षत्रियों ने अपना कार्यक्षेत्र देश रक्षा खेती-बाड़ी एवं सामाजिक कार्यों तक सीमित रखा तथा वैश्य ने व्यापार को बढ़ाने के लिए और अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बाकी अन्य वर्णों को नोचना शुरु कर दिया धीरे-धीरे शूद्रों ने भी अन्य तीन वर्गों द्वारा सहायता ना मिलने के कारण समाज में वह सारे काम त्याग दिए जिनको वह अपने जीवन यापन के लिए समाज के लिए सेवा स्वरूप करता आ रहा था आज भी अगर आप भारत के गांव का भ्रमण करें तो आप पाएंगे कि बहुत सारी जातियां अन्य तीन वर्णों को पूरा सहयोग देती है अपने सामाजिक कार्यों से जैसे-जैसे वस्तु विनिमय से अर्थव्यवस्था मौद्रिक विनिमय तक आई वैसे वैसे समाज की सभी जरूरतें पैसे से पूरी होने लगी और सभी वर्णों का अधिक ध्यान धन अर्जन पर जाने लगा ना कि समाज के लिए उत्तरदायित्व निभाने एवं वस्तु उत्पादन करने में आज उत्पादन कुछ गिने-चुने लोग ही करते हैं जो आज बड़े बिजनेस टाइकून बन चुके हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वह किस जाति के हैं लेकिन लोग अनुवांशिक गुणों को बचाए रखने के लिए जाति का सहारा लेते हैं व्यवसाय करने के लिए प्रॉफिट अर्थात लाभ देखते हैं तथा सुविधाएं प्राप्त करने के लिए पुश्तैनी पोजीशन का दंभ भरते हैं

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जब तक समाज दोहरी मानसिकता से बाहर नहीं आएगा तब तक यह झूठा ढोंग दिखावा खत्म नहीं होगा सही मायनों में जाति व्यवस्था कार्यशैली पर स्थापित की गई थी लेकिन बाद में जाति व्यवस्था वंशवाद पर आधारित हो गई यह बदलते समाज की जरूरत भी थी आज के संदर्भ में ना तो सभी ब्राह्मणों का गुजारा कर्मकांड से है और ना ही गुरुकुल व्यवस्था पाई जाती है शिक्षा दीक्षा देने के लिए और ना ही सारे क्षत्रिय खेती और देश रक्षा का कार्य करते हैं ना ही सारे वैश्य व्यापार करते हैं और ना ही सारे शूद्र सामाजिक साफ सफाई का ही कार्य करते हैं इसलिए वर्ण व्यवस्था बदलते समाज के लिए उचित नहीं है इन चार वर्णों की हजारों हजारों जातियां कार्यशैली पर आधारित बनी लेकिन मुद्रा आधारित जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग अपना लाभ और अपनी कार्यक्षमता देखते हुए अपना व्यवसाय चुनने लगे इसलिए वर्ण व्यवस्था और जातिगत आधार आज धीरे-धीरे तात्कालिक समाज में बेबुनियाद होते जा रहे हैं l
यदि हिंदू भारतीय या मूल समाज आज भी स्वयं को बचाना चाहता है तो अपने निजी स्वार्थ से उठकर समाज में एकता का भाव साबित करना ही होगा अन्यथा जिस प्रकार वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में और जाति व्यवस्था गोत्र से उपनाम में टूटी उसी प्रकार बड़े साझा परिवार इकाई परिवारों में टूट गए और अब एक एक व्यक्ति को काफिर बता कर हत्या की जा रही है उनकी ना सिर्फ जमीने घर बार औरतें और बच्चों को लूटा जा रहा है एक दिन यह भी हो सकता है कि देश से एक धर्म एक समाज एक ऐसा समुदाय ही खत्म हो जाए जो सर्व धर्म समभाव की भावना रखता है l और जो लोग आतंकवाद को धर्म का नाम देते हैं वह अफगानिस्तान जैसा माहौल भारत में भी बना दें l

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